तालिबान कौन हैं, उनका इतिहास क्या है और वो क्या चाहते हैं?

करीब 20 साल पहले, अमेरिका के नेतृत्‍व में दावा हुआ कि अफगानिस्‍तान से तालिबानी शासन का अंत हो गया है। अभी ज्‍यादा वक्‍त नहीं गुजरा है और हालात यह हैं कि अफगान राष्‍ट्रपति अशरफ गनी विदेश भाग चुके हैं, काबुल में तालिबान की एंट्री हो चुकी है। एक डर जो मन में कहीं छिपा बैठा था कि तालिबान के वापस आते ही दमन और अत्‍याचारों का दौर शुरू होगा, वह अब सच साबित होने लगा है। मगर ऐसा भी न समझें कि पिछले 20 साल बड़े शांति से गुजरे। अमेरिका और उसकी साथी सेनाओं का अफगानिस्‍तान पर पूरा नियंत्रण कभी था ही नहीं। हिंसा लगातार जारी रही… नतीजा आज हम सबके सामने है।पश्‍तून में तालिबान का मतलब ‘छात्र’ होता है, एक तरह से यह उनकी शुरुआत (मदरसों) को जाहिर करता है। उत्‍तरी पाकिस्‍तान में सुन्‍नी इस्‍लाम का कट्टरपंथी रूप सिखाने वाले एक मदरसे में तालिबान का जन्‍म हुआ। सोवियत काल के बाद जो गृहयुद्ध छिड़ा, 1990s के उन शुरुआती सालों में तालिबान मजबूत हुआ। शुरुआत में लोग उन्‍हें बाकी मुजाहिदीनों के मुकाबले इसलिए ज्‍यादा पसंद करते थे क्‍योंकि तालिबान का वादा था कि भ्रष्‍टाचार और अराजकता खत्‍म कर देंगे। मगर तालिबान के हिंसक रवैये और इस्‍लामिक कानून वाली क्रूर सजाओं ने जनता में आतंक फैला दिया।इसके बाद तालिबान ने संगीत, टीवी और सिनेमा पर रोक लगा दी गई। मर्दों को दाढ़ी रखना जरूरी हो गया था, महिलाएं बिना सिर से पैर तक खुद को ढके बाहर नहीं निकल सकती थीं। 10 साल से अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगा दी गई. बामियान में बुद्ध की ऐतिहासिक मूर्ति को तोड़कर तालिबान ने धार्मिक कट्टरता भी दुनिया को दिखाई. तालिबान ने 1995 में हेरात और 1996 में काबुल पर कब्‍जा कर लिया था। 1998 आते-आते लगभग पूरे अफगानिस्‍तान पर तालिबान की हुकूमत हो चुकी थी।अफगानिस्तान से रूसी सैनिकों की वापसी के बाद 1990 के दशक की शुरुआत में उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान का उभार हुआ था. पश्तो भाषा में तालिबान का मतलब होता है छात्र खासकर ऐसे छात्र जो कट्टर इस्लामी धार्मिक शिक्षा से प्रेरित हों. कहा जाता है कि कट्टर सुन्नी इस्लामी विद्वानों ने धार्मिक संस्थाओं के सहयोग से पाकिस्तान में इनकी बुनियाद खड़ी की थी. तालिबान पर देववंदी विचारधारा का पूरा प्रभाव है. तालिबान को खड़ा करने के पीछे सऊदी अरब से आ रही आर्थिक मदद को जिम्मेदार माना गया था. शुरुआती तौर पर तालिबान ने ऐलान किया कि इस्लामी इलाकों से विदेशी शासन खत्म करना, वहां शरिया कानून और इस्लामी राज्य स्थापित करना उनका मकसद है. शुरू-शुरू में सामंतों के अत्याचार, अधिकारियों के करप्शन से आजीज जनता ने तालिबान में मसीहा देखा और कई इलाकों में कबाइली लोगों ने इनका स्वागत किया लेकिन बाद में कट्टरता ने तालिबान की ये लोकप्रियता भी खत्म कर दी लेकिन तब तक तालिबान इतना पावरफुल हो चुका था कि उससे निजात पाने की लोगों की उम्मीद खत्म हो गई. जानकारी के अनुसार तालिबान को पैसों की कोई कमी नहीं। हर साल एक बिलियन डॉलर से ज्‍यादा की कमाई होती है। एक अनुमान के मुताबिक, उन्‍होंने 2019-20 में 1.6 बिलियन डॉलर कमाए। तालिबान की इनकम के मुख्‍य जरिए इस प्रकार हैं:ड्रग्स से हर साल 416 मिलियन डॉलर, खनन से पिछले साल 464 मिलियन डॉलर, रंगदारी से 160 मिलियन डॉलर, चंदा से 2020 में 240 मिलियन डॉलर, निर्यात से हर साल 240 मिलियन डॉलर रियल एस्‍टेट से हर साल 80 मिलियन डॉलर, और बाकी दोस्‍तों से मदद जैसे रूस, ईरान, पाकिस्‍तान और सऊदी अरब जैसे देशों से 100 मिलियन डॉलर से 500 मिलियन डॉलर के बीच सहायता मिलती है।जानी मानी अधिकार कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई ने अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे पर हैरत जताई है, साथ ही मलाला ने कहा कि वह संकटग्रस्त देश में रह रही महिलाओं,अल्पसंख्यकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए चिंतित हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर ये तालिबान इतना ताकतवर कैसे बन गया। उसकी ताकत के पीछे किसका हाथ है। 1990 के दशक में तालिबान ताकतवर हुआ. उस समय अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेनाओं की वापसी हो रही थी. पश्‍तूनों के नेतृत्व में तालिबान और ज्‍यादा ताकतवर हुआ. कहते हैं कि तालिबान सबसे पहले धार्मिक आयोजनों या मदरसों के जरिए मजबूत होता गया और इसका ज्‍यादातर पैसा सऊदी अरब से आता था.तालिबान धीरे-धीरे अफगानिस्‍तान पर हावी होता गया और उसने शरिया कानून लागू करना शुरू कर दिया.पिछले 3 महीनों से जारी लड़ाई में कंधार, हेरात, कुंडूज, जलालाबाद, बल्क समेत अफगानिस्तान के बाकी हिस्से एक-एक कर तालिबान के कब्जे में आते चले जा रहे थे लेकिन राजधानी काबुल में इतनी जल्दी हलचल मचने वाली है इसका अंदाजा शायद ही किसी को था. अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व वाली सेना ने तालिबान को साल 2001 में सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था. लेकिन धीरे-धीरे ये समूह खुद को मज़बूत करता गया और अब एक बार फिर से इसका दबदबा देखने को मिल रहा है. क़रीब दो दशक बाद, अमेरिका 11 सितंबर, 2021 तक अफ़ग़ानिस्तान से अपने सभी सैनिकों को हटाने की तैयारी कर रहा है. वहीं तालिबानी लड़ाकों का नियंत्रण क्षेत्र बढ़ता जा रहा है. आशंका यह भी उभरने लगी है कि वे सरकार को अस्थिर कर सकते हैं.

News by Tanvi Tanuja